नालंदा विश्वविद्यालय: भारत की ज्ञान परंपरा का अमर प्रतीक
जब पूरी दुनिया अज्ञानता के अंधकार में डूबी थी, तब भारत की धरती पर ज्ञान का एक ऐसा दीपक जल रहा था, जिसकी रोशनी सीमाओं से परे जाकर एशिया के अनेक देशों को आलोकित कर रही थी। यह दीपक था — नालंदा विश्वविद्यालय, एक ऐसा प्राचीन शिक्षालय जिसने भारतीय बौद्धिक परंपरा को वैश्विक पहचान दिलाई।
🔶 इतिहास की शुरुआत: किसने बनाई थी नालंदा?
नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना लगभग 5वीं शताब्दी ईस्वी में गुप्त वंश के सम्राट कुमारगुप्त प्रथम ने करवाई थी। बिहार के नालंदा जिले में स्थित यह विश्वविद्यालय एक शांतिपूर्ण बौद्ध अध्ययन केंद्र के रूप में प्रारंभ हुआ, लेकिन जल्दी ही यह विभिन्न विषयों का अंतरराष्ट्रीय शिक्षण संस्थान बन गया।
🔶 एक वैश्विक शैक्षणिक केंद्र
नालंदा कोई साधारण गुरुकुल नहीं था। यह दुनिया का प्रथम पूर्ण आवासीय विश्वविद्यालय था, जहाँ एक समय में 10,000 छात्र और 2,000 आचार्य शिक्षा ग्रहण करते थे। चीन, कोरिया, जापान, श्रीलंका और तिब्बत जैसे देशों से विद्यार्थी यहाँ पढ़ने आते थे।
🔶 शिक्षा के विषय और पठन-पाठन प्रणाली
नालंदा में केवल बौद्ध धर्म ही नहीं, बल्कि विविध विषयों पर भी गहन अध्ययन होता था:
- बौद्ध दर्शन, हीनयान एवं महायान परंपराएँ
- वैदिक ग्रंथ एवं संस्कृत भाषा
- चिकित्सा विज्ञान (आयुर्वेद), योग और शल्यचिकित्सा
- गणित, ज्योतिष और खगोलशास्त्र
- तर्कशास्त्र, नीति और दर्शन
यहाँ पढ़ाई का तरीका व्याख्यान, संवाद, और शोध आधारित था। विद्यार्थियों को मौखिक परीक्षा पास करने के बाद ही प्रवेश मिलता था।
🔶 ह्वेनसांग और नालंदा की ख्याति
ह्वेनसांग (Xuanzang), एक महान चीनी बौद्ध भिक्षु, नालंदा में कई वर्ष तक रहे। उन्होंने लिखा कि यह विश्वविद्यालय “बुद्धि, अनुशासन और करुणा का आदर्श संगम” था। उनके यात्रा वृत्तांतों से ही आज हम नालंदा की महानता को विस्तार से जान पाते हैं।
🔶 ज्ञान का भंडार: धर्मगंज पुस्तकालय
नालंदा का सबसे गौरवशाली अंग था उसका विशाल पुस्तकालय “धर्मगंज”, जिसमें तीन विशाल भवन थे — रत्नसागर, रत्नरंजक, और रत्नोदधि। इनमें लाखों पांडुलिपियाँ और हस्तलिखित ग्रंथ संग्रहित थे। कहा जाता है कि जब विश्वविद्यालय को जलाया गया, तो यह पुस्तकालय महीनों तक जलता रहा।
🔶 विनाश और पुनरुत्थान
नालंदा विश्वविद्यालय का पतन 12वीं शताब्दी में हुआ जब बख्तियार खिलजी ने इसे आक्रमण कर नष्ट कर दिया। इसके बाद सदियों तक यह धरोहर इतिहास के अंधकार में गुम रही।
हालांकि, 21वीं सदी में भारत सरकार ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग से “नया नालंदा विश्वविद्यालय” की स्थापना की है, जो इस गौरवशाली विरासत को आधुनिक रूप में आगे बढ़ा रहा है।
निष्कर्ष
नालंदा विश्वविद्यालय केवल प्राचीन भारत का गौरव नहीं था, बल्कि यह मानव सभ्यता के बौद्धिक विकास का स्तंभ था। आज भी यह हमें यह सिखाता है कि ज्ञान सीमाओं से परे होता है, और एक सच्चा शिक्षालय वही है जहाँ विचारों को उड़ान मिलती है, और विविधता को सम्मान।
