फ़रवरी 14, 2026

भारतीय चुनावों में पारदर्शिता पर संग्राम: “वोट चोरी” के आरोप से बढ़ा राजनीतिक तापमान

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नई दिल्ली, 10 अगस्त 2025 – देश में लोकतंत्र की मजबूती को लेकर एक नई बहस ने जोर पकड़ लिया है। 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद, विपक्षी दलों खासकर कांग्रेस ने मौजूदा चुनावी प्रणाली की पारदर्शिता पर सवाल खड़े करते हुए “वोट चोरी” के आरोप लगाए हैं। राहुल गांधी ने यह साफ कहा है कि जब तक मतदाता सूची पूरी तरह शुद्ध और त्रुटिरहित नहीं होगी, तब तक निष्पक्ष चुनाव की उम्मीद करना मुश्किल है।

कांग्रेस का रुख: लोकतंत्र की बुनियाद पर चोट

कांग्रेस का आरोप है कि मतदाता सूचियों में गड़बड़ी लोकतांत्रिक सिद्धांत ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ को कमजोर करती है। पार्टी ने चुनाव आयोग से मांग की है कि डिजिटल वोटर लिस्ट न केवल सार्वजनिक हो, बल्कि ऐसी प्रणाली बनाई जाए जिसे हर राजनीतिक दल और आम नागरिक स्वतंत्र रूप से ऑडिट कर सकें। कांग्रेस का कहना है कि यह केवल चुनावी मुद्दा नहीं, बल्कि लोकतंत्र की रक्षा की जंग है।

राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन की तैयारी

11 अगस्त को पार्टी मुख्यालय 24 अकबर रोड पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की अध्यक्षता में एक रणनीतिक बैठक होगी। इसमें सभी महासचिव, प्रदेश प्रभारी और मोर्चा प्रमुख शामिल होंगे। बैठक का मुख्य उद्देश्य देशभर में जन-जागरूकता अभियान चलाकर मतदाता सूची में कथित हेरफेर के खिलाफ माहौल बनाना है।

बिहार में SIR प्रक्रिया पर आपत्ति

बिहार में चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया को भी कांग्रेस ने पक्षपातपूर्ण करार दिया है। इस मुद्दे पर “इंडिया” गठबंधन के अन्य दल भी कांग्रेस के साथ खड़े हैं। पार्टी नेताओं का कहना है कि यह समय निर्णायक कार्रवाई का है, जैसे आज़ादी के दौर में भारत छोड़ो आंदोलन हुआ था, वैसे ही अब लोकतंत्र को बचाने के लिए कड़ा कदम जरूरी है।

राहुल गांधी के तर्क और उदाहरण

7 अगस्त को प्रेस वार्ता में राहुल गांधी ने दावा किया कि कर्नाटक में पार्टी को 16 सीटें मिलने की संभावना थी, मगर नतीजे 9 सीटों पर आकर रुक गए। उन्होंने महादेवरपुरा क्षेत्र का हवाला देते हुए लगभग 1.5 लाख वोटों की संदिग्ध गड़बड़ी का आरोप लगाया।

चुनावी प्रणाली पर बढ़ते सवाल

इन बयानों और प्रस्तावित आंदोलनों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूची की पारदर्शिता और चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। आने वाले महीनों में यह देखना अहम होगा कि यह विवाद केवल राजनीतिक बयानबाज़ी तक सीमित रहता है या फिर वास्तविक चुनावी सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाए जाते हैं।

भारत के लिए यह बहस केवल सत्ता की खींचतान नहीं, बल्कि उस लोकतांत्रिक ढांचे की परीक्षा है जिस पर करोड़ों नागरिकों का विश्वास टिका हुआ है।


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