ग्रीन फाइनेंस: भारत के सतत भविष्य की नई दिशा

नई दिल्ली में हाल ही में आयोजित FICCI के LEADs कार्यक्रम के चौथे संस्करण में केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने ग्रीन फाइनेंस को भारत की दीर्घकालिक प्रगति और सतत विकास का प्रमुख स्तंभ बताया। उनका यह बयान इस बात का संकेत है कि भारत अब पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास को एक साथ लेकर चलने के लिए गंभीरता से प्रयासरत है।
ग्रीन फाइनेंस क्या है?
ग्रीन फाइनेंस, जिसे हिंदी में “हरित वित्त” कहा जाता है, वह वित्तीय व्यवस्था है जो ऐसे प्रोजेक्ट्स और निवेशों को प्रोत्साहित करती है जिनका सीधा संबंध पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन से निपटने से हो। इसमें सौर और पवन ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन, जैव विविधता की रक्षा, जल प्रबंधन और ऊर्जा दक्षता जैसी परियोजनाओं को बढ़ावा दिया जाता है।
आर्थिक विकास और पर्यावरण का संगम
केंद्रीय मंत्री का कहना है कि हरित वित्त न केवल पर्यावरणीय चुनौतियों से लड़ने का साधन है, बल्कि यह प्रतिस्पर्धी और लचीली अर्थव्यवस्था बनाने की कुंजी भी है। ग्रीन फाइनेंस के जरिए देश में नए निवेश के अवसर उत्पन्न होते हैं और निजी क्षेत्र की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित होती है। इससे पारिस्थितिकी तंत्र के पुनर्निर्माण और इको-रेस्टोरेशन के कार्यों को नई गति मिलती है।
सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड्स और वैश्विक विश्वास
भारत सरकार द्वारा हाल ही में जारी किए गए सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड्स ने अंतरराष्ट्रीय निवेशकों का ध्यान आकर्षित किया है। ये बॉन्ड न केवल भारत की हरित पहल को मजबूती देते हैं, बल्कि यह भी दर्शाते हैं कि वैश्विक बाजार भारत की पर्यावरणीय नीतियों को भरोसेमंद मानता है। यह कदम भारत की ग्रीन इकोनॉमी को वैश्विक मंच पर और अधिक मजबूत बनाता है।
पेरिस समझौता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग
पेरिस समझौते का अनुच्छेद 6 जलवायु वित्त के क्षेत्र में बेहद अहम भूमिका निभाता है। इसके तहत अंतरराष्ट्रीय कार्बन बाजार विकसित करने और देशों के बीच सहयोग बढ़ाने का प्रावधान है। यह न केवल अरबों डॉलर की जलवायु पूंजी खोल सकता है, बल्कि विकासशील देशों को उनके जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने में भी सहायक सिद्ध हो सकता है।
ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम की पहल
भारत का पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) हाल ही में ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम में बदलाव लेकर आया है। इसका उद्देश्य निजी कंपनियों और निवेशकों को पर्यावरणीय जिम्मेदारियों में शामिल करना है। यह कार्यक्रम न केवल प्रदूषण नियंत्रण और संसाधनों के संरक्षण को बढ़ावा देगा, बल्कि भारत के जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने में भी सहायक बनेगा।
निष्कर्ष
ग्रीन फाइनेंस आज केवल एक आर्थिक अवधारणा नहीं रह गया है, बल्कि यह भारत की भविष्य की रणनीति का अहम हिस्सा बन चुका है। यह जलवायु परिवर्तन के खिलाफ मजबूत हथियार है और साथ ही टिकाऊ, समावेशी तथा प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था का आधार भी। भारत जिस तेजी और दृढ़ता से इस क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है, वह उसे निकट भविष्य में वैश्विक नेतृत्व की भूमिका दिला सकता है।
