फ़रवरी 15, 2026

बीजेपी शासन में महिला सुरक्षा पर उठते सवाल: अपहरण, यातना और संस्थागत जवाबदेही का गंभीर संकट

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उत्तर प्रदेश में एक महिला के अपहरण, नशीला पदार्थ देकर 48 दिनों तक सामूहिक बलात्कार और उसके बाद पुलिसकर्मियों द्वारा बार-बार यौन शोषण की दर्दनाक घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया है। यह सिर्फ एक अपराध नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था और महिला सुरक्षा को लेकर पैदा हुई गहरी विफलताओं का आईना है। सोशल मीडिया पर नेताओं, संगठनों और आम नागरिकों की प्रतिक्रियाओं ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है।

समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने इस घटना को बीजेपी सरकार में महिलाओं की सुरक्षा की “कड़वी सच्चाई” बताते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने महिला आयोग की निष्क्रियता पर सवाल उठाए और कहा कि लगातार बढ़ते जघन्य अपराध सरकार की संवेदनहीनता और कमजोर तंत्र का परिणाम हैं। यह बयान राजनीतिक आलोचना नहीं बल्कि उस व्यवस्था की चिंता है जो महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराधों को रोक पाने में असफल दिख रही है।

घटना से उठे महत्वपूर्ण प्रश्न

यह मामला कई गंभीर सवाल उठाता है—

  1. एक महिला को 48 दिनों तक कैद कर रखना और लगातार अत्याचार करना कानून-व्यवस्था की कितनी बड़ी नाकामी है?
  2. क्या राज्य में अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण मिल रहा है, जिसके कारण वे इस हद तक बेखौफ हैं?
  3. अगर पुलिसकर्मी ही अपराध में शामिल पाए जाते हैं, तो आम नागरिक किससे न्याय की उम्मीद करे?
  4. महिला आयोग व अन्य संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका और जिम्मेदारी कहां खो रही है?

महिला सुरक्षा: केवल नारा या वास्तविकता?

बीजेपी लगातार महिला हितैषी योजनाओं और ‘सुरक्षा’ को अपनी उपलब्धि बताती रही है। लेकिन घटनाएं यह बताती हैं कि कागज़ पर मौजूद योजनाएं और धरातल पर होने वाली कार्रवाई के बीच खाई बढ़ती जा रही है।
महिला सुरक्षा सिर्फ पुलिस गश्त या हेल्पलाइन नंबर बढ़ाने से नहीं आती, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था बनाकर आती है जो अपराधियों को तुरंत, निश्चित और कठोर सजा दे—चाहे वे आम नागरिक हों या वर्दीधारी अधिकारी।

समाधान की ज़रूरत, राजनीति से ऊपर उठकर

इस घटना को राजनीतिक वाद-विवाद तक सीमित रखने के बजाय इसे महिला अधिकारों के लिए व्यापक सुधार का अवसर बनाना चाहिए।

  • पुलिस तंत्र की पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करना होगा।
  • पीड़ित महिलाओं के लिए सुरक्षित और भरोसेमंद शिकायत प्रणाली बनानी होगी।
  • महिला आयोग और मानवाधिकार आयोग को अधिक शक्तिशाली और सक्रिय भूमिका निभाने की जरूरत है।
  • सबसे महत्वपूर्ण, समाज को भी महिलाओं के प्रति संवेदनशील बनाना होगा, क्योंकि सुरक्षा केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, सामाजिक चेतना का भी हिस्सा है।

निष्कर्ष

यह घटना सिर्फ उत्तर प्रदेश या किसी एक राजनीतिक दल की विफलता नहीं, बल्कि उस सोच और प्रणाली की कमजोरी का प्रमाण है जो महिलाओं को बराबरी का अधिकार तो देती है, लेकिन सुरक्षित वातावरण देने में असमर्थ साबित होती है।
अगर सरकारें राजनीतिक लाभ-हानि से ऊपर उठकर कानून-व्यवस्था को मजबूत करें, संस्थाएं स्वतंत्र और सशक्त हों, और समाज महिलाओं को सम्मान दे—तभी वास्तविक सुरक्षा सुनिश्चित हो सकती है।

महिलाओं की सुरक्षा किसी सरकार के आने-जाने पर नहीं, बल्कि एक संवेदनशील और न्यायपूर्ण व्यवस्था पर निर्भर करती है।

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