फ़रवरी 12, 2026

केंद्र की आर्थिक नीतियों पर अखिलेश यादव का प्रहार: विदेशी फलों की एंट्री से भारतीय बागवानी पर खतरा

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देश की राजनीति में आर्थिक नीतियों को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने केंद्र की भाजपा सरकार पर आरोप लगाया है कि उसकी नीतियाँ भारतीय किसानों, विशेषकर फल उत्पादकों, के हितों की अनदेखी कर रही हैं। उनके अनुसार मौजूदा व्यवस्था विदेशी कंपनियों के लिए लाभकारी बनती जा रही है, जबकि देश के अन्नदाता और बागवान लगातार संकट में फँसते जा रहे हैं।

विदेशी ब्रांड्स का असर और देसी खेती की चुनौती

अखिलेश यादव ने हाल ही में सोशल मीडिया के माध्यम से विदेशी फलों के प्रचार पर सवाल उठाते हुए कहा कि अब भारतीय बाजार में विदेशी कंपनियाँ सीधे किसानों की मेहनत का विकल्प बनती जा रही हैं। उन्होंने विदेशी नाशपाती (पेयर्स) के विज्ञापन का उदाहरण देते हुए चेतावनी दी कि यदि यही रुझान रहा, तो देश का फल बाजार धीरे-धीरे बाहरी कंपनियों के नियंत्रण में चला जाएगा।
उनका मानना है कि यह केवल व्यापार का सवाल नहीं, बल्कि देश की कृषि आत्मनिर्भरता से जुड़ा मुद्दा है।

“उत्पादन नहीं, मुनाफे की राजनीति”

सपा अध्यक्ष ने भाजपा की आर्थिक सोच पर तीखा तंज कसते हुए कहा कि वर्तमान सरकार का फोकस उत्पादन बढ़ाने के बजाय व्यापारिक मुनाफे पर है। उन्होंने आरोप लगाया कि नीति-निर्माण में किसानों से अधिक बिचौलियों और बड़े कॉरपोरेट हितों को प्राथमिकता दी जा रही है।
उनके अनुसार जब न खेती मजबूत होगी और न उद्योग, तो देश में रोजगार के अवसर कैसे बढ़ेंगे—यह सबसे बड़ा सवाल है।

फल उत्पादकों की रोज़ी-रोटी पर सीधा असर

अखिलेश यादव का कहना है कि विदेशी फलों का बढ़ता आयात और प्रचार सीधे तौर पर भारतीय फल उत्पादकों की आय को प्रभावित कर रहा है। स्थानीय किसान पहले ही लागत, मौसम और बाज़ार की अनिश्चितता से जूझ रहे हैं। ऐसे में सरकार की नीतियाँ यदि घरेलू उत्पादन की बजाय विदेशी आपूर्ति को बढ़ावा देंगी, तो बागवानी क्षेत्र और अधिक कमजोर होगा।

आगे का रास्ता क्या हो सकता है?

इस पूरे विवाद के बीच यह जरूरी हो जाता है कि कृषि नीति में संतुलन लाया जाए। घरेलू फल उत्पादकों को आधुनिक तकनीक, भंडारण सुविधाएँ, उचित मूल्य और बाज़ार तक सीधी पहुँच उपलब्ध कराना समय की मांग है।
साथ ही, स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए जागरूकता अभियान और नियंत्रित आयात नीति अपनाई जानी चाहिए, ताकि भारतीय किसान वैश्विक प्रतिस्पर्धा में टिक सकें।

निष्कर्ष

अखिलेश यादव की यह टिप्पणी सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय कृषि और बागवानी के भविष्य को लेकर एक गंभीर सवाल खड़ा करती है। यदि नीति-निर्माण में किसानों को केंद्र में नहीं रखा गया, तो इसका प्रभाव ग्रामीण अर्थव्यवस्था, रोजगार और खाद्य सुरक्षा—तीनों पर पड़ सकता है।


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