मार्को रुबियो, ‘डॉनरो डॉक्ट्रिन’ और सत्ता पर व्यंग्य: जब राजनीति बना इंटरनेट तमाशा

साल 2026 के शुरुआती दिनों में अमेरिका की राजनीति और डिजिटल मीडिया में एक अजीब-सा शब्द तेजी से फैलने लगा— ‘डॉनरो डॉक्ट्रिन’। पहली नज़र में यह किसी नई अमेरिकी विदेश नीति जैसा लगता है, लेकिन गहराई में जाने पर साफ हो जाता है कि यह एक तीखा व्यंग्य है, जिसने सत्ता, हस्तक्षेप और मीडिया की भूमिका पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
इस पूरे प्रकरण की सबसे दिलचस्प बात यह रही कि इसमें अमेरिकी सीनेटर मार्को रुबियो को विदेश मंत्री के रूप में प्रस्तुत किया गया—जबकि हकीकत में ऐसा नहीं है। यही बिंदु इस व्यंग्य को और प्रभावी बना देता है।
‘डॉनरो डॉक्ट्रिन’ आखिर है क्या?
डॉनरो डॉक्ट्रिन दरअसल 19वीं सदी की प्रसिद्ध मोनरो डॉक्ट्रिन का व्यंग्यात्मक संस्करण है। 1823 में घोषित मोनरो डॉक्ट्रिन का मूल भाव यह था कि अमेरिका अपने क्षेत्र में किसी बाहरी शक्ति का दखल बर्दाश्त नहीं करेगा।
लेकिन डॉनरो डॉक्ट्रिन इस सिद्धांत को उलट कर पेश करता है। इसमें मज़ाकिया अंदाज़ में दिखाया गया है कि अमेरिका अब लैटिन अमेरिका में खुले तौर पर दखल देगा—चाहे वह राजनीतिक नियंत्रण हो, संसाधनों पर पकड़ हो या सुरक्षा के नाम पर सैन्य हस्तक्षेप। यह व्यंग्य असल में अमेरिकी वैश्विक भूमिका पर एक आलोचनात्मक टिप्पणी है।
मार्को रुबियो की काल्पनिक भूमिका
इस पूरे कथानक में मार्को रुबियो को एक ऐसे विदेश मंत्री के रूप में दिखाया गया, जो एक चर्चित टीवी कार्यक्रम में बैठकर डॉनरो डॉक्ट्रिन को सही ठहरा रहे हैं। उनके मुंह से कहे गए कथित संवाद—कि अमेरिका अब “वैश्विक गतिविधियों का केंद्र” बन चुका है—पूरी तरह काल्पनिक थे।
यह प्रस्तुति मशहूर व्यंग्यात्मक वेबसाइट The Onion की थी, जिसकी खास पहचान ही यह है कि वह वास्तविकता और कल्पना की सीमाओं को जानबूझकर धुंधला कर देती है। यही कारण है कि बहुत से लोग इस व्यंग्य को पहली नज़र में सच मान बैठे।
वेनेजुएला और अमेरिकी हस्तक्षेप का संदर्भ
डॉनरो डॉक्ट्रिन पर आधारित इस व्यंग्य को और धार उस समय मिली, जब इसमें वेनेजुएला से जुड़ी एक काल्पनिक लेकिन उत्तेजक स्थिति दिखाई गई। कहानी के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति ने वहां सैन्य कार्रवाई को “नई नीति” के तहत जायज़ ठहराया।
हालांकि यह भी व्यंग्य का हिस्सा था, लेकिन इसने वास्तविक दुनिया की उन बहसों को छू लिया जो वर्षों से अमेरिकी हस्तक्षेपवादी नीति को लेकर चल रही हैं। अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभुता और नैतिकता जैसे मुद्दे इस बहस के केंद्र में आ गए।
सोशल मीडिया: व्यंग्य या भ्रम?
इस पूरे मामले में सोशल मीडिया ने आग में घी का काम किया। कुछ यूजर्स ने इसे गंभीर खबर समझकर साझा किया, तो कुछ ने इसे अमेरिकी नीति की “सच्चाई” बताकर प्रचारित किया। कुछ अकाउंट्स ने जानबूझकर इसे वास्तविक घटना की तरह पेश किया, जिससे भ्रम और बढ़ गया।
यह घटना बताती है कि आज के डिजिटल युग में व्यंग्य और तथ्य के बीच की सीमा कितनी नाजुक हो चुकी है।
निष्कर्ष: हंसी के पीछे छुपा सवाल
डॉनरो डॉक्ट्रिन भले ही एक मज़ाक हो, लेकिन यह सवाल बिल्कुल गंभीर है—
क्या वैश्विक राजनीति में शक्तिशाली देश नैतिक सीमाओं का पालन कर रहे हैं, या वे नए नाम देकर पुरानी नीतियों को दोहरा रहे हैं?
मार्को रुबियो की काल्पनिक छवि, वेनेजुएला का संदर्भ और सोशल मीडिया की भूमिका—ये सभी मिलकर यह दिखाते हैं कि व्यंग्य आज सिर्फ मनोरंजन नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक चेतना जगाने का एक प्रभावशाली औज़ार बन चुका है।
