फ़रवरी 15, 2026

ट्रंप का प्रवासी डेटा और भारत की अनुपस्थिति: आंकड़ों से आगे की राजनीति

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अमेरिकी राजनीति में एक बार फिर प्रवासियों को लेकर बहस तेज हो गई है। 4 जनवरी 2026 को अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड जे. ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया मंच ‘ट्रुथ सोशल’ पर एक सांख्यिकीय चार्ट साझा किया, जिसमें विभिन्न देशों से आए प्रवासियों द्वारा अमेरिकी सरकार की वेलफेयर योजनाओं का लाभ लेने का प्रतिशत दिखाया गया। यह पोस्ट न केवल अपने आंकड़ों के कारण चर्चा में आई, बल्कि इसलिए भी कि इस सूची में भारत का नाम पूरी तरह गायब था।

किन देशों के प्रवासी रहे केंद्र में?

चार्ट में दर्शाए गए आंकड़ों के अनुसार कुछ छोटे और संघर्षग्रस्त देशों के प्रवासियों द्वारा सरकारी सहायता लेने का अनुपात काफी अधिक बताया गया। सूची में शीर्ष पर मार्शल आइलैंड्स के प्रवासी थे, जिनके बारे में दावा किया गया कि बड़ी संख्या में वे वेलफेयर योजनाओं पर निर्भर हैं। इसके बाद अफगानिस्तान, डोमिनिकन रिपब्लिक, कांगो और गिनी जैसे देशों के नाम सामने आए।

मध्यम श्रेणी में यूक्रेन, निकारागुआ, कोसोवो और पाकिस्तान जैसे देश शामिल थे। खास बात यह रही कि एशियाई उपमहाद्वीप से पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल का उल्लेख तो हुआ, लेकिन दुनिया के सबसे बड़े प्रवासी समुदायों में गिने जाने वाले भारतीयों का नाम नदारद रहा।

ट्रंप की पोस्ट: आंकड़े या एजेंडा?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह पोस्ट केवल सांख्यिकीय जानकारी साझा करने तक सीमित नहीं थी। ट्रंप लंबे समय से “अमेरिका फर्स्ट” नीति के तहत सख्त आव्रजन नियमों के पक्षधर रहे हैं। उनके दूसरे कार्यकाल में अवैध प्रवासन के खिलाफ कार्रवाई तेज हुई है—सीमा सुरक्षा कड़ी की गई है, प्रवासी स्थिति की समीक्षा हुई है और वेलफेयर सिस्टम पर निर्भरता को लेकर सवाल उठाए गए हैं।

ऐसे माहौल में यह चार्ट एक राजनीतिक संदेश भी माना जा रहा है, जिससे यह संकेत दिया जा सकता है कि किन देशों से आए प्रवासियों को प्रशासन अतिरिक्त जांच या सख्ती की नजर से देखता है।

भारत का नाम क्यों नहीं दिखा?

भारत की अनुपस्थिति ने कई तरह की अटकलों को जन्म दिया है:

  • क्या भारतीय मूल के प्रवासी औसतन वेलफेयर योजनाओं पर कम निर्भर रहते हैं?
  • क्या यह डेटा चयन की सीमा या प्रस्तुति की रणनीति का परिणाम है?
  • या फिर यह भारत-अमेरिका संबंधों की संवेदनशीलता को ध्यान में रखकर किया गया कोई सोचा-समझा फैसला?

विशेषज्ञों के अनुसार, भारतीय प्रवासी समुदाय को आमतौर पर उच्च शिक्षा, पेशेवर नौकरियों और कम सरकारी सहायता निर्भरता से जोड़ा जाता है। यही कारण हो सकता है कि उन्हें इस तरह की सूची में शामिल नहीं किया गया।

कूटनीतिक और सामाजिक प्रभाव

हालांकि इस पोस्ट का सीधे तौर पर भारत-अमेरिका संबंधों पर कोई तात्कालिक असर नहीं दिखा है, लेकिन यह घटना यह जरूर दर्शाती है कि आंकड़ों की प्रस्तुति भी वैश्विक राजनीति का हिस्सा बन चुकी है। एक देश की अनुपस्थिति भी उतना ही संदेश दे सकती है, जितना किसी का नाम शामिल होना।

निष्कर्ष

डोनाल्ड ट्रंप द्वारा साझा किया गया प्रवासी वेलफेयर डेटा केवल संख्याओं का खेल नहीं है। यह आव्रजन नीति, घरेलू राजनीति और अंतरराष्ट्रीय संकेतों का मिश्रण है। भारत का इस सूची में न होना अपने-आप में एक सवाल भी है और एक संकेत भी। यह बहस आने वाले समय में और गहरी हो सकती है—खासतौर पर तब, जब प्रवासन वैश्विक राजनीति का केंद्रीय मुद्दा बनता जा रहा है।


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