रूस-यूक्रेन संघर्ष: ज़ेलेंस्की का तीखा आरोप — “युद्ध अचानक नहीं, बल्कि सोची-समझी रणनीति का नतीजा”

पूर्वी यूरोप में जारी रूस-यूक्रेन युद्ध एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की ने जनवरी 2026 के अंतिम सप्ताह में दिए अपने बयान में रूस पर स्पष्ट शब्दों में आरोप लगाया कि यह संघर्ष किसी तात्कालिक स्थिति या उकसावे की प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि क्रेमलिन द्वारा वर्षों पहले तैयार की गई सैन्य योजना का परिणाम है।
ज़ेलेंस्की का यह बयान ऐसे समय सामने आया है जब रूस ने यूक्रेन के कई शहरी इलाकों में मिसाइल और ड्रोन हमलों की तीव्रता बढ़ा दी है। इन हमलों के साथ ही “ओरेश्निक” नाम की उन्नत हाइपरसोनिक मिसाइल के संभावित इस्तेमाल की खबरों ने वैश्विक सुरक्षा विशेषज्ञों की चिंता और बढ़ा दी है।
संवाद नहीं, दबाव की नीति
यूक्रेनी राष्ट्रपति के अनुसार, यदि रूस का वास्तविक उद्देश्य शांति बहाल करना होता, तो वह कूटनीतिक बातचीत और अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता को प्राथमिकता देता। इसके विपरीत, लगातार जारी हमले यह संकेत देते हैं कि मॉस्को शक्ति प्रदर्शन के ज़रिये अपने लक्ष्य हासिल करना चाहता है।
यूक्रेन का दावा है कि रूसी हमलों का निशाना केवल सैन्य ठिकाने नहीं, बल्कि ऊर्जा ढांचा, परिवहन व्यवस्था और रिहायशी क्षेत्र भी बन रहे हैं। इससे आम नागरिकों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी बुरी तरह प्रभावित हुई है और मानवीय संकट गहराता जा रहा है।
पहले से तैयार थी योजना?
कीव प्रशासन का कहना है कि उन्हें खुफिया एजेंसियों के माध्यम से संभावित हमलों की जानकारी पहले ही मिल चुकी थी। इससे यह धारणा मजबूत होती है कि हालिया हमले किसी तात्कालिक फैसले का परिणाम नहीं, बल्कि पूर्व-नियोजित सैन्य अभियान का हिस्सा हैं।
ज़ेलेंस्की ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को आगाह करते हुए कहा कि इस संघर्ष को “दोनों पक्षों की समान जिम्मेदारी” के रूप में प्रस्तुत करना वास्तविकता को तोड़-मरोड़ कर पेश करने जैसा है। उनके अनुसार, जब एक पक्ष संप्रभु राष्ट्र की सीमाओं का उल्लंघन करता है और दूसरा केवल अपने अस्तित्व की रक्षा करता है, तो दोनों को एक ही तराजू में तौलना न्यायसंगत नहीं है।
वैश्विक राजनीति पर असर
रूस-यूक्रेन युद्ध अब केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह गया है। ऊर्जा आपूर्ति, वैश्विक व्यापार मार्ग और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा ढांचे पर इसका सीधा असर पड़ रहा है। नाटो देशों और यूरोपीय संघ में इस बात को लेकर बहस तेज़ हो गई है कि रूस की बढ़ती आक्रामकता का जवाब किस स्तर तक दिया जाए।
ज़ेलेंस्की ने पश्चिमी देशों से यह अपील भी की कि वे सिर्फ बयानबाज़ी तक सीमित न रहें, बल्कि यूक्रेन की सुरक्षा और पुनर्निर्माण के लिए ठोस कदम उठाएं।
आगे की राह: शांति या लंबा संघर्ष?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हालात ऐसे ही बने रहे, तो यह युद्ध और लंबा खिंच सकता है। शांति की संभावना तभी बन सकती है जब सभी पक्ष अंतरराष्ट्रीय कानून, क्षेत्रीय संप्रभुता और मानवीय मूल्यों का सम्मान करें।
ज़ेलेंस्की के शब्दों में, “यूक्रेन युद्ध नहीं चाहता, लेकिन आत्मसमर्पण भी नहीं।” यह वाक्य न केवल यूक्रेन की स्थिति को दर्शाता है, बल्कि उस व्यापक वैश्विक चुनौती की ओर भी इशारा करता है, जहां शक्ति और संवाद के बीच संतुलन तलाशना पहले से कहीं अधिक कठिन हो गया है।
