मानसून सत्र में सरकार-विपक्ष आमने-सामने, रिजिजू का बड़ा हमला—12 विधेयक पास, लेकिन बहस और उत्पादकता पर उठे सवाल

0

नई दिल्ली। संसद का मानसून सत्र 2026 विधायी कामकाज के साथ-साथ सरकार और विपक्ष के…

AI Generated photo

नई दिल्ली। संसद का मानसून सत्र 2026 विधायी कामकाज के साथ-साथ सरकार और विपक्ष के बीच तीखे राजनीतिक टकराव के लिए भी चर्चा में रहा। सत्र के समापन के बाद केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्ष पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि विपक्षी दल महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा से बचते रहे और बार-बार के हंगामे तथा वॉकआउट के कारण संसद की उत्पादकता प्रभावित हुई।

रिजिजू ने सत्र का आकलन दो अलग-अलग पैमानों पर किया। उनके मुताबिक विधायी कामकाज की दृष्टि से मानसून सत्र सफल रहा, क्योंकि संसद ने कुल 12 विधेयकों को पारित किया। हालांकि, जब इसी सत्र को बहस और चर्चा के नजरिए से देखा गया तो तस्वीर उतनी संतोषजनक नहीं रही। लोकसभा की उत्पादकता करीब 19 प्रतिशत, जबकि राज्यसभा की उत्पादकता लगभग 39 प्रतिशत रही।

इससे संसद के कामकाज को लेकर एक महत्वपूर्ण बहस सामने आई है कि क्या विधेयकों की संख्या ही किसी सत्र की सफलता का पैमाना होनी चाहिए या फिर कानून बनने से पहले उन पर होने वाली विस्तृत चर्चा को भी उतना ही महत्व मिलना चाहिए।

रिजिजू ने विपक्ष पर लगाया चर्चा से बचने का आरोप

मानसून सत्र के समापन के अवसर पर पत्रकारों से बातचीत में किरेन रिजिजू ने विपक्ष के रवैये पर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षी दल चर्चा से पीछे हट रहे थे और सदन की कार्यवाही को बाधित करने की स्थिति पैदा कर रहे थे।

रिजिजू के अनुसार, उनके संसदीय अनुभव में यह असामान्य स्थिति रही कि विपक्ष चर्चा के बजाय विरोध और व्यवधान की ओर अधिक जाता दिखाई दिया। उन्होंने यह भी कहा कि कई मौकों पर विपक्षी सांसदों के विरोध और वॉकआउट के बावजूद सत्तारूढ़ गठबंधन के सांसद तथा कुछ विपक्षी दलों के सदस्य बहस और चर्चा में शामिल होते रहे।

सरकार का तर्क है कि संसद का मुख्य उद्देश्य जनता से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करना और आवश्यक कानूनों को आगे बढ़ाना है। ऐसे में लगातार होने वाला व्यवधान संसदीय समय के उपयोग को प्रभावित करता है।

12 विधेयकों का पारित होना सरकार के लिए बड़ी उपलब्धि

सरकार की नजर से देखें तो मानसून सत्र में विधायी कामकाज महत्वपूर्ण रहा। संसद ने कुल 12 विधेयकों को मंजूरी दी। सरकार ने इन विधायी उपलब्धियों को सत्र की सफलता का प्रमुख आधार माना।

इनमें पब्लिक एग्जामिनेशन्स (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) विधेयक खास महत्व रखता है। परीक्षा प्रणाली में पेपर लीक, अनुचित साधनों और अन्य गड़बड़ियों को लेकर देश में लंबे समय से चिंता व्यक्त की जाती रही है। प्रतियोगी और सार्वजनिक परीक्षाओं की विश्वसनीयता बनाए रखना लाखों विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़ा विषय है।

इस कानून का उद्देश्य सार्वजनिक परीक्षाओं में अनुचित साधनों पर रोक लगाने के लिए कानूनी ढांचा मजबूत करना है। रिजिजू के मुताबिक इस विधेयक पर लोकसभा और राज्यसभा दोनों में चर्चा हुई और इसके बाद इसे पारित किया गया।

सरकार के लिए यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और निष्पक्षता का सवाल सीधे युवाओं के विश्वास से जुड़ा है।

लोकसभा की 19 प्रतिशत उत्पादकता ने बढ़ाई चिंता

मानसून सत्र के दौरान लोकसभा की उत्पादकता करीब 19 प्रतिशत रहने की बात सामने आई। इसका अर्थ है कि निर्धारित संसदीय समय का अपेक्षाकृत छोटा हिस्सा ही नियमित कामकाज और चर्चा में इस्तेमाल हो सका।

संसद में हंगामा नया विषय नहीं है। विपक्ष कई बार सरकार पर दबाव बनाने के लिए सदन में विरोध करता है। लेकिन जब विरोध के कारण लगातार कार्यवाही प्रभावित होती है तो प्रश्न उठता है कि सांसदों को मिले संवैधानिक मंच का बेहतर इस्तेमाल कैसे किया जाए।

कम उत्पादकता का असर केवल सरकार और विपक्ष पर नहीं पड़ता। देश के अलग-अलग क्षेत्रों से चुनकर आए सांसदों के पास स्थानीय और राष्ट्रीय मुद्दों को सदन में उठाने का अवसर सीमित हो जाता है। प्रश्न पूछने, नीतियों पर चर्चा करने और सरकार से जवाब मांगने के लिए उपलब्ध समय भी प्रभावित होता है।

राज्यसभा की स्थिति लोकसभा से बेहतर, फिर भी संतोषजनक नहीं

राज्यसभा में उत्पादकता करीब 39 प्रतिशत रही। यह लोकसभा के आंकड़े से बेहतर जरूर है, लेकिन संसदीय कामकाज के आदर्श स्तर की तुलना में इसे भी पर्याप्त नहीं माना जा सकता।

राज्यसभा में भी विरोध, नारेबाजी और वॉकआउट जैसी घटनाएं देखने को मिलीं। हालांकि सरकार के अनुसार सत्ता पक्ष और कुछ विपक्षी दलों के सांसदों ने बहस में हिस्सा लिया।

यह स्थिति बताती है कि संसदीय लोकतंत्र में राजनीतिक मतभेदों के बावजूद कामकाज को पूरी तरह ठप होने से बचाने की आवश्यकता है। असहमति लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया है, लेकिन असहमति को बहस और तर्क के रूप में दर्ज कराना संसद की मूल भावना के अधिक अनुकूल माना जाता है।

सरकार और विपक्ष के दावों में बड़ा अंतर

मानसून सत्र के दौरान सरकार और विपक्ष के बीच मूल विवाद केवल विधेयकों को लेकर नहीं था, बल्कि संसद के संचालन और चर्चा की प्राथमिकताओं को लेकर भी था।

सरकार का आरोप रहा कि विपक्ष जानबूझकर सदन की कार्यवाही बाधित कर रहा है। वहीं विपक्ष की राजनीति का आधार यह रहा कि सरकार को गंभीर राष्ट्रीय और जनहित के मुद्दों पर जवाब देना चाहिए।

यही अंतर संसद के भीतर लगातार टकराव का कारण बना। दोनों पक्ष अपने-अपने राजनीतिक दृष्टिकोण को सही बताते रहे। सत्ता पक्ष ने विधायी उपलब्धियों को सामने रखा, जबकि विपक्ष ने सरकार से जवाबदेही और चर्चा की मांग को प्राथमिकता दी।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में दोनों भूमिकाएं महत्वपूर्ण हैं। सरकार का काम नीतियां बनाना और उन्हें लागू करना है, जबकि विपक्ष का महत्वपूर्ण दायित्व सरकार से सवाल पूछना और उसकी नीतियों की समीक्षा करना है।

संसद परिसर में भी दिखा राजनीतिक तनाव

सत्र के दौरान संसद परिसर के बाहर भी राजनीतिक गतिविधियां तेज रहीं। सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और विपक्षी INDIA ब्लॉक से जुड़े सांसदों के बीच विरोध-प्रदर्शन और जवाबी प्रदर्शन देखने को मिले।

इन घटनाओं ने यह स्पष्ट किया कि संसद के भीतर का राजनीतिक संघर्ष केवल सदन की कार्यवाही तक सीमित नहीं था। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर लोकतांत्रिक परंपराओं को कमजोर करने के आरोप लगाए।

राजनीतिक प्रदर्शन लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन जब इनका असर संसदीय कामकाज पर पड़ता है तो उनकी उपयोगिता और सीमा को लेकर सवाल खड़े होते हैं।

क्या विधायी सफलता ही पर्याप्त है?

मानसून सत्र का सबसे बड़ा सवाल यही है कि किसी संसद सत्र की सफलता को किस आधार पर मापा जाए।

यदि 12 विधेयक पारित हो जाते हैं, तो इसे विधायी दृष्टि से उपलब्धि कहा जा सकता है। लेकिन यदि सदन में उन विधेयकों और दूसरे महत्वपूर्ण विषयों पर पर्याप्त चर्चा नहीं हो पाती, तो लोकतांत्रिक विमर्श की गुणवत्ता को लेकर चिंता स्वाभाविक है।

कानून बनाने की प्रक्रिया में चर्चा का महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि सांसद अलग-अलग क्षेत्रों और सामाजिक समूहों का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनके सुझावों और आपत्तियों से प्रस्तावित कानून के विभिन्न पहलुओं पर विचार हो सकता है।

इसीलिए संसद की सफलता केवल कानूनों की संख्या से नहीं बल्कि उनकी गुणवत्ता, चर्चा की गहराई और सदस्यों की भागीदारी से भी जुड़ी होती है।

विपक्ष के सामने भी आत्ममंथन की जरूरत

जहां सरकार को विपक्ष के सवालों को गंभीरता से लेना चाहिए, वहीं विपक्ष को भी अपनी रणनीति पर विचार करना होगा। लगातार वॉकआउट या कार्यवाही बाधित करने से राजनीतिक संदेश तो दिया जा सकता है, लेकिन इससे विस्तृत संसदीय बहस का अवसर कम हो जाता है।

विपक्ष यदि सरकार को प्रभावी तरीके से घेरना चाहता है तो उसे आंकड़ों, तथ्यों और वैकल्पिक नीतियों के साथ सदन में अपनी बात रखने पर अधिक जोर देना होगा। इससे उसकी आलोचना अधिक प्रभावशाली और रिकॉर्ड पर अधिक मजबूती से दर्ज हो सकती है।

इसी तरह सरकार के लिए भी यह जरूरी है कि वह विपक्ष की महत्वपूर्ण मांगों और सवालों को केवल राजनीतिक विरोध मानकर खारिज न करे।

सत्र का समापन और आगे की चुनौती

गुरुवार को लोकसभा और राज्यसभा को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किए जाने के साथ मानसून सत्र समाप्त हो गया। सत्र के अंत तक राजनीतिक टकराव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ और विरोध-प्रदर्शन का दौर जारी रहा।

अब आने वाले सत्रों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक मतभेदों के बावजूद संसद का कामकाज सुचारु तरीके से कैसे चलाया जाए।

संसद में बहस तभी सार्थक होगी जब सत्ता पक्ष अपनी नीतियों का बचाव करने के लिए तैयार हो और विपक्ष मजबूत सवालों के साथ सरकार को जवाबदेह बनाए। दोनों पक्षों के बीच मतभेद रहना लोकतंत्र के लिए समस्या नहीं है; समस्या तब पैदा होती है जब मतभेद संवाद का रास्ता बंद कर दें।

निष्कर्ष

मानसून सत्र 2026 ने भारतीय संसदीय लोकतंत्र के सामने एक महत्वपूर्ण तस्वीर रखी है। एक तरफ 12 विधेयकों का पारित होना विधायी कामकाज की उपलब्धि है, वहीं दूसरी तरफ लोकसभा में 19 प्रतिशत और राज्यसभा में 39 प्रतिशत उत्पादकता ने संसदीय बहस की गुणवत्ता पर सवाल खड़े किए हैं।

किरेन रिजिजू का विपक्ष पर चर्चा से बचने का आरोप और विपक्ष की सरकार से जवाबदेही की मांग इस पूरे राजनीतिक विवाद के दो अलग-अलग पक्ष हैं। वास्तविक समाधान किसी एक पक्ष की जीत में नहीं बल्कि ऐसे संसदीय वातावरण में है जहां विरोध भी हो, सवाल भी पूछे जाएं और आवश्यक कानूनों पर पर्याप्त चर्चा भी हो।

भारतीय लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि सत्ता और विपक्ष दोनों अपनी-अपनी संवैधानिक भूमिकाओं को समझें। सरकार के लिए विधेयक पारित करना जरूरी है, लेकिन उस पर चर्चा कराना भी उतना ही महत्वपूर्ण है; वहीं विपक्ष के लिए विरोध जरूरी हो सकता है, लेकिन प्रभावी बहस और वैकल्पिक सुझाव देना उसकी जिम्मेदारी का अहम हिस्सा है। यही संतुलन संसद को अधिक उत्पादक, जवाबदेह और लोकतांत्रिक बना सकता है।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

इन्हे भी देखें