ईरान-अमेरिका टकराव के बीच भारत की प्रतिक्रिया: वैश्विक अस्थिरता पर चिंता

नई दिल्ली, 22 जून 2025 — पश्चिम एशिया में एक बार फिर युद्ध जैसे हालात बनते नजर आ रहे हैं। अमेरिका द्वारा ईरान के परमाणु ठिकानों पर किए गए “सटीक हमलों” ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता की लहर दौड़ा दी है। इन हमलों के बाद जहां एक ओर ईरान ने अपने संप्रभुता पर हुए हमले की कड़ी निंदा की है, वहीं भारत सहित कई देशों ने क्षेत्रीय शांति और स्थिरता बनाए रखने की अपील की है।
भारत सरकार ने रविवार को जारी एक आधिकारिक बयान में कहा, “हम पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव को लेकर अत्यंत चिंतित हैं। भारत हमेशा से कूटनीतिक संवाद और शांतिपूर्ण समाधान का समर्थक रहा है।” विदेश मंत्रालय ने यह भी दोहराया कि किसी भी प्रकार की सैन्य कार्रवाई से बचते हुए सभी पक्षों को संयम बरतना चाहिए।
अमेरिका के हमले की पृष्ठभूमि
अमेरिका ने यह दावा किया है कि ईरान द्वारा परमाणु हथियारों के विकास को लेकर की जा रही गतिविधियाँ अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा हैं। इसी आधार पर उसने 21 जून की रात को ईरान के पश्चिमी इलाकों में मौजूद कई परमाणु शोध केंद्रों और मिसाइल ठिकानों पर हमला किया। अमेरिकी रक्षा विभाग ने इसे “प्रिवेंटिव स्ट्राइक” यानी पूर्व-सावधानी के तौर पर परिभाषित किया है।
ईरान की तीखी प्रतिक्रिया
ईरान ने इस कार्रवाई को ‘सीधी आक्रामकता’ करार देते हुए जवाबी कदम उठाने की चेतावनी दी है। तेहरान से जारी बयान में कहा गया कि अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन किया है और इसका अंजाम भुगतना पड़ेगा।
वैश्विक प्रतिक्रिया
संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ, रूस और चीन समेत दुनिया के प्रमुख देशों ने भी इस सैन्य कार्रवाई पर चिंता जताई है और दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि तनाव यूं ही बढ़ता रहा, तो इसका असर वैश्विक तेल आपूर्ति, व्यापार और भू-राजनीतिक स्थिरता पर पड़ सकता है।
भारत की भूमिका और संभावित प्रभाव
भारत, जो ईरान और अमेरिका दोनों का रणनीतिक साझेदार है, अब एक जटिल कूटनीतिक स्थिति में है। एक ओर भारत ईरान से ऊर्जा जरूरतें पूरी करता है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका के साथ उसका गहरा रक्षा और व्यापारिक संबंध है। जानकारों का मानना है कि भारत अब ‘संतुलनकारी कूटनीति’ के माध्यम से इस संकट में मध्यस्थता की भूमिका निभा सकता है।
वहीं, खाड़ी क्षेत्र में बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासी काम करते हैं। ऐसे में भारत सरकार की पहली प्राथमिकता होगी कि अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करे और किसी भी आपात स्थिति के लिए तैयार रहे।
निष्कर्ष:
ईरान-अमेरिका टकराव ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि परमाणु नीति और सैन्य प्रभुत्व की होड़ दुनिया को कितनी तेजी से संकट की ओर धकेल सकती है। भारत जैसे देशों के लिए यह समय है कि वे शांति के पक्ष में ठोस कदम उठाएं और वैश्विक स्थिरता के लिए अपनी भूमिका निभाएं।
