फ़रवरी 13, 2026

जाति आधारित जनगणना: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और वर्तमान परिदृश्य

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जाति आधारित जनगणना भारत में एक ऐसा मुद्दा है, जो सदियों से राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक विमर्श का केंद्र रहा है। भारतीय समाज में जाति एक महत्वपूर्ण कारक है, जो लोगों की सामाजिक स्थिति, आर्थिक अवसरों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को प्रभावित करता है। इस लेख में हम जाति आधारित जनगणना के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और इसके वर्तमान परिदृश्य की चर्चा करेंगे।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

भारत में जनगणना का इतिहास 19वीं सदी से शुरू होता है। पहली बार 1871 में ब्रिटिश शासन के दौरान जनगणना की गई थी। इस जनगणना में लोगों की जाति के बारे में भी जानकारी इकट्ठी की गई थी। उस समय ब्रिटिश प्रशासन ने जाति को एक महत्वपूर्ण पहचान मानते हुए जनगणना में इसका समावेश किया। यह कदम इसलिए उठाया गया था ताकि ब्रिटिश शासन भारत की जातिगत संरचना को समझ सके और उसे अपने शासन के लिए इस्तेमाल कर सके।

1931 में ब्रिटिश सरकार द्वारा जाति आधारित जनगणना की गई, जो स्वतंत्र भारत में अंतिम जाति आधारित जनगणना थी। इसके बाद, 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, भारतीय सरकार ने जाति आधारित जनगणना को समाप्त कर दिया। हालांकि, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की गणना अभी भी की जाती है, लेकिन अन्य पिछड़े वर्गों (OBC) और अन्य जातियों के बारे में कोई विशेष जनगणना नहीं होती।

स्वतंत्रता के बाद जातिगत जनगणना

1947 के बाद, भारतीय संविधान ने जाति व्यवस्था को खत्म करने और समानता स्थापित करने के लिए कई प्रावधान किए। इसके बावजूद, जाति आधारित आरक्षण प्रणाली ने जाति की पहचान को बरकरार रखा। 1980 में मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर OBC वर्ग को आरक्षण दिया गया, लेकिन इसकी आधारिक जनगणना 1931 की जनगणना पर ही आधारित थी।

जाति आधारित जनगणना की वर्तमान स्थिति

वर्तमान में जाति आधारित जनगणना का मुद्दा फिर से चर्चा में है। कई राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन OBC वर्ग के लिए अलग से जाति आधारित जनगणना की मांग कर रहे हैं। उनका मानना है कि इससे OBC वर्ग के वास्तविक आंकड़े सामने आएंगे, जो उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए आवश्यक हैं। इसके साथ ही, जातिगत असमानताओं को खत्म करने के लिए बेहतर नीतियां बनाई जा सकेंगी।

2011 की जनगणना में सरकार ने ‘सोशियो-इकनोमिक एंड कास्ट सेंसस’ (SECC) का आयोजन किया, जिसमें जाति की जानकारी भी एकत्र की गई थी। हालांकि, इस डेटा को सार्वजनिक नहीं किया गया, और यह मुद्दा अभी भी विवादास्पद बना हुआ है।

जाति आधारित जनगणना के लाभ और चुनौतियां

जाति आधारित जनगणना के पक्ष में तर्क दिया जाता है कि यह समाज के वंचित वर्गों की वास्तविक स्थिति को उजागर करेगा और उनके विकास के लिए आवश्यक कदम उठाने में सहायक होगा। इससे सरकार को अधिक सटीक नीतियां बनाने में मदद मिलेगी, जो सामाजिक न्याय और समता की दिशा में प्रभावी हो सकेंगी।

हालांकि, इसके विरोधियों का मानना है कि जाति आधारित जनगणना से समाज में जातिवाद और बढ़ सकता है। यह समाज को और अधिक विभाजित कर सकता है और जातिगत राजनीति को बढ़ावा दे सकता है। इसके अलावा, कुछ लोगों का मानना है कि यह भारत के संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है, जो जातिविहीन समाज की स्थापना की बात करते हैं।

निष्कर्ष

जाति आधारित जनगणना एक महत्वपूर्ण और विवादास्पद मुद्दा है, जो भारत के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक ताने-बाने को प्रभावित करता है। इसके पक्ष और विपक्ष में कई तर्क हैं, लेकिन इसका अंतिम निर्णय सरकार और समाज को सामूहिक रूप से लेना होगा। यदि जाति आधारित जनगणना को सही तरीके से लागू किया जाता है, तो यह सामाजिक न्याय और समानता की दिशा में एक बड़ा कदम हो सकता है।

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