इज़राइल की स्थापना और यहूदी समुदाय का संघर्ष

हाल ही में इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अपने एक बयान में कहा कि “एक समय था जब यहूदियों की हत्या को सामान्य माना जाता था, लेकिन इज़राइल राष्ट्र की स्थापना ने उस मानसिकता को हमेशा के लिए बदल दिया।” यह कथन केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि यहूदियों के हजारों वर्षों के संघर्ष, उत्पीड़न और अस्तित्व की लड़ाई का प्रतीक है।
ऐतिहासिक उत्पीड़न और यहूदी पहचान
यहूदी समुदाय का इतिहास दर्द और प्रतिरोध दोनों से भरा हुआ है। प्राचीन काल से लेकर मध्ययुग तक, उन्हें धार्मिक असहिष्णुता, सामाजिक बहिष्कार और हिंसा का सामना करना पड़ा। यूरोप में तो यहूदी-विरोधी भावना इतनी गहरी थी कि उन्हें बार-बार पलायन और नरसंहार झेलने पड़े।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नाज़ी जर्मनी द्वारा किया गया होलोकॉस्ट यहूदियों की पीड़ा की चरम परिणति थी, जिसमें लाखों निर्दोष लोगों को केवल उनकी धार्मिक पहचान के कारण मौत के घाट उतार दिया गया।
इज़राइल का उदय: आत्मरक्षा और आत्मसम्मान का प्रतीक
1948 में इज़राइल की स्थापना यहूदियों के लिए केवल एक राष्ट्र का जन्म नहीं था, बल्कि यह उनके आत्मसम्मान, सुरक्षा और स्वतंत्र अस्तित्व की घोषणा थी। यह देश उनके लिए उस लंबे इतिहास के अन्याय का जवाब था, जिसमें उनकी पहचान बार-बार कुचली गई थी।
आज नेतन्याहू का बयान यही याद दिलाता है कि अब यहूदी केवल पीड़ित नहीं, बल्कि अपने राष्ट्र और नागरिकों की सुरक्षा के लिए संगठित शक्ति हैं। इज़राइल की सेना, राजनीतिक मजबूती और वैश्विक कूटनीति इसी आत्मनिर्भरता का प्रतीक है।
वर्तमान संदर्भ और महत्व
वर्तमान समय में इज़राइल कई चुनौतियों का सामना कर रहा है—मध्य पूर्व की अस्थिरता, सुरक्षा संकट और पड़ोसी देशों के साथ तनाव। इसके बावजूद, यहूदी समुदाय के लिए यह राष्ट्र केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि उनकी जीवित पहचान है।
नेतन्याहू का यह वक्तव्य इज़राइल और यहूदी समाज के लिए गहरे संदेश देता है: अतीत के अन्याय को भूलना संभव नहीं, लेकिन अब उनका भविष्य उनके अपने हाथों में है।
