मार्को रुबियो की येरूशलम यात्रा: “अमेरिका फर्स्ट” बनाम विदेश नीति की जटिलताएँ

हाल ही में अमेरिकी सीनेटर मार्को रुबियो ने येरूशलम का दौरा किया और इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ पश्चिमी दीवार (Western Wall) पर प्रार्थना करते हुए अपनी तस्वीर सोशल मीडिया पर साझा की। इस पोस्ट में उन्होंने येरूशलम को इज़राइल की “शाश्वत राजधानी” बताते हुए अमेरिकी राजदूत हकाबी का भी उल्लेख किया।
रुबियो का यह कदम केवल एक धार्मिक स्थल की यात्रा नहीं है, बल्कि यह अमेरिका की विदेश नीति और मध्य पूर्व की राजनीति में नई बहस का सूत्रपात करता है। पश्चिमी दीवार यहूदी धर्म के लिए गहन आस्था का प्रतीक है, जबकि येरूशलम की स्थिति दशकों से इज़राइल-फिलिस्तीन विवाद का मूल केंद्र रही है। ऐसे में किसी अमेरिकी सीनेटर द्वारा इस स्थल को इज़राइल की राजधानी के रूप में मान्यता देना कई तरह के राजनीतिक और कूटनीतिक संदेश देता है।
“अमेरिका फर्स्ट” पर उठे सवाल
रुबियो की पोस्ट के तुरंत बाद एक उपयोगकर्ता की टिप्पणी ने बड़ी बहस को जन्म दिया—“यह अमेरिका फर्स्ट कैसे है?”। यह सवाल सीधे तौर पर पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उस नीति पर चोट करता है जिसमें उन्होंने घरेलू प्राथमिकताओं को विदेशी संबंधों से ऊपर रखने की बात कही थी।
ट्रंप के समर्थक मानते हैं कि अमेरिका को अपने संसाधन घरेलू समस्याओं—जैसे स्वास्थ्य, रोजगार और अवसंरचना—पर खर्च करने चाहिए, न कि अंतरराष्ट्रीय विवादों में। ऐसे में रुबियो की इज़राइल यात्रा को आलोचक “अमेरिका फर्स्ट” की अवधारणा से विरोधाभासी मानते हैं।
अमेरिका-इज़राइल संबंधों का परिप्रेक्ष्य
दूसरी ओर, कई विश्लेषक इस यात्रा को अमेरिका और इज़राइल के पारंपरिक गठबंधन की पुष्टि के रूप में देखते हैं। लंबे समय से वाशिंगटन और येरूशलम के बीच मजबूत कूटनीतिक और सैन्य संबंध रहे हैं। अमेरिकी राजनीति में इज़राइल के समर्थन को अक्सर राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक हितों से जोड़ा जाता है। इस दृष्टि से, रुबियो की यात्रा को सहयोग की निरंतरता कहा जा सकता है।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया और विवाद
येरूशलम की स्थिति हमेशा से विवादित रही है। अधिकांश देश इसे विवादित क्षेत्र मानते हैं और अपने दूतावास तेल अवीव में रखते हैं। ऐसे में रुबियो द्वारा येरूशलम को इज़राइल की “शाश्वत राजधानी” बताना एक संवेदनशील राजनीतिक घोषणा है। इससे फिलिस्तीनी नेतृत्व और उनके समर्थकों में असंतोष पैदा होना स्वाभाविक है।
सोशल मीडिया और सार्वजनिक बहस
यह घटना यह भी दर्शाती है कि सोशल मीडिया किस प्रकार वैश्विक राजनीति पर तुरंत प्रभाव डाल सकता है। एक साधारण पोस्ट ने विदेश नीति, घरेलू राजनीति और राष्ट्रवाद बनाम अंतरराष्ट्रीय सहयोग जैसे जटिल प्रश्नों पर बहस छेड़ दी। “यह अमेरिका फर्स्ट कैसे है?” जैसा प्रश्न दर्शाता है कि अमेरिकी समाज में घरेलू प्राथमिकताओं और वैश्विक दायित्वों के बीच गहरा टकराव मौजूद है।
निष्कर्ष
मार्को रुबियो की येरूशलम यात्रा केवल एक धार्मिक स्थल का दौरा नहीं, बल्कि अमेरिका की विदेश नीति की दिशा और “अमेरिका फर्स्ट” की अवधारणा की वास्तविकता पर गंभीर सवाल खड़े करती है। यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले समय में अमेरिका येरूशलम और फिलिस्तीन प्रश्न पर क्या रुख अपनाता है और क्या यह मुद्दा अमेरिकी घरेलू राजनीति में चुनावी बहस का हिस्सा बनता है।
