कन्नौज की सियासत में उबाल: अखिलेश यादव का भाजपा पर सीधा प्रहार, SIR अभियान पर खड़े किए गंभीर सवाल

उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर कन्नौज चर्चा के केंद्र में है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भारतीय जनता पार्टी और उसके पूर्व सांसद सुब्रत पाठक पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित करने के आरोप लगाते हुए तीखा हमला बोला है। मामला मतदाता सूची से नाम हटाए जाने और चुनावी संतुलन बिगाड़ने की कथित कोशिशों से जुड़ा है।
SIR अभियान बना सियासी टकराव का कारण
देशभर में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान का उद्देश्य मतदाता सूची को दुरुस्त करना और फर्जी या दोहराव वाले नामों को हटाना बताया जा रहा है। लेकिन कन्नौज में इस अभियान ने राजनीतिक विवाद का रूप ले लिया, जब भाजपा के पूर्व सांसद सुब्रत पाठक ने सार्वजनिक रूप से दावा किया कि बड़ी संख्या में वोटरों के नाम सूची से हटाए जाएंगे। उनके इस बयान को विपक्ष ने चुनावी रणनीति से जोड़कर देखा।
सुब्रत पाठक के बयान पर अखिलेश यादव की कड़ी प्रतिक्रिया
अखिलेश यादव ने इस बयान को लोकतंत्र के लिए खतरनाक करार देते हुए चुनाव आयोग से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की। उन्होंने आरोप लगाया कि मतदाता सूची के नाम पर वास्तविक और वैध वोटरों को बाहर करने की साजिश रची जा रही है। अखिलेश ने कहा कि भाजपा पहले भी दूसरे राज्यों में इस तरह के प्रयोग कर चुकी है और अब वही तरीका उत्तर प्रदेश में अपनाने की कोशिश हो रही है।
उन्होंने व्यंग्यात्मक अंदाज़ में कहा कि भाजपा के कुछ नेता बयान देते समय अपने ही दल की सरकार की बातों को भूल जाते हैं। साथ ही उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर कटाक्ष करते हुए संकेत दिया कि इतने बड़े दावे शीर्ष नेतृत्व की जानकारी के बिना संभव नहीं हैं।
सपा कार्यकर्ताओं को सतर्क रहने का संदेश
अखिलेश यादव ने पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों से अपील की कि वे मतदाता सूची की हर प्रक्रिया पर नज़र रखें और किसी भी तरह की अनियमितता का विरोध करें। उन्होंने भरोसा जताया कि जनता सच्चाई समझती है और आने वाले चुनावों में समाजवादी पार्टी को मजबूत जनादेश मिलेगा।
लोकतंत्र और पारदर्शिता पर बड़ा सवाल
यह पूरा घटनाक्रम चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है। मतदाता सूची लोकतंत्र की बुनियाद होती है और उस पर किसी भी तरह का संदेह जनता के विश्वास को कमजोर कर सकता है। अब सबकी निगाहें चुनाव आयोग की भूमिका और भाजपा की आधिकारिक प्रतिक्रिया पर टिकी हैं।
