फ़रवरी 13, 2026

दिल्ली के अंडरवर्ल्ड की नई हलचल: वसीम की हत्या और GTB अस्पताल की पुरानी परछाईं

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राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में संगठित अपराध की परतें एक बार फिर खुलती दिखाई दे रही हैं। शास्त्री पार्क इलाके में कुख्यात अपराधी वसीम की हत्या ने न केवल स्थानीय सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि 2024 के चर्चित GTB अस्पताल गोलीकांड की स्मृति को भी फिर से ताज़ा कर दिया है। यह घटना संकेत देती है कि गैंगवार की जड़ें समय के साथ कमजोर नहीं, बल्कि और गहरी हुई हैं।

🩸 शास्त्री पार्क की रात: जब भरोसा ही हथियार बन गया

नववर्ष से ठीक पहले की रात, 31 दिसंबर 2025 को, वसीम को गंभीर हालत में जेपीसी अस्पताल पहुंचाया गया। डॉक्टरों की तमाम कोशिशों के बावजूद उसे बचाया नहीं जा सका। पोस्टमॉर्टम और प्राथमिक जांच में सामने आया कि उसके शरीर पर धारदार हथियार से किए गए कई हमलों के निशान थे।

पुलिस जांच में जो बात सबसे ज्यादा चौंकाने वाली रही, वह यह कि आरोपी कोई बाहरी दुश्मन नहीं, बल्कि वसीम के नज़दीकी लोग बताए जा रहे हैं। दो सगे भाइयों की गिरफ्तारी और हत्या में प्रयुक्त चाकू की बरामदगी ने इस हत्याकांड को “अंदरूनी साजिश” की दिशा में मोड़ दिया है।

🔥 GTB अस्पताल कांड: जब इलाज की जगह मातम बना

साल 2024 में वसीम पहले भी जानलेवा हमले का शिकार हुआ था। उस समय उसे गोली लगने के बाद गुरु तेग बहादुर अस्पताल में भर्ती कराया गया था। लेकिन अस्पताल की दीवारें उसे सुरक्षा नहीं दे सकीं। इलाज के दौरान वहां घुसे हथियारबंद हमलावरों ने फायरिंग कर दी।

इस हमले में वसीम तो बच गया, लेकिन रियाजुद्दीन नामक एक अन्य मरीज की जान चली गई। जांच एजेंसियों के अनुसार, हमलावर हसीम बाबा गिरोह से जुड़े थे और इस साजिश में नाबालिग अपराधियों तक का इस्तेमाल किया गया था। यह मामला अस्पतालों की सुरक्षा पर राष्ट्रीय बहस का कारण बन गया था।

🧩 साजिश के तार: हथियार, नेटवर्क और गैंगवार

जांच में यह भी खुलासा हुआ कि GTB शूटआउट में इस्तेमाल हथियारों की आपूर्ति अनस नामक व्यक्ति के जरिए हुई थी। इससे स्पष्ट हुआ कि गैंगवार केवल सड़क तक सीमित नहीं, बल्कि संगठित नेटवर्क के जरिए संचालित हो रही थी।

अब, वसीम की ताज़ा हत्या ने यह सवाल फिर से खड़ा कर दिया है कि क्या पुराने दुश्मनों ने अधूरे बदले को अंजाम तक पहुंचाया, या फिर लालच और विश्वासघात ने यह खेल रचा।

📲 सोशल मीडिया और अपराध की खुली चुनौती

हत्या के बाद सोशल मीडिया पर सक्रिय कुछ अकाउंट्स ने इस वारदात को लेकर सनसनीखेज दावे किए। कथित तौर पर हसीम बाबा गिरोह से जुड़े इन संदेशों में लिखा गया कि “अस्पताल में जो अधूरा रह गया था, वह अब समाप्त हो गया।”

इन पोस्टों में यह संकेत भी दिया गया कि वसीम की हत्या में उसके किसी करीबी ने पैसों के लिए भूमिका निभाई। हालांकि पुलिस इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं कर रही है, लेकिन डिजिटल गतिविधियों को जांच का अहम हिस्सा बनाया गया है।

⚖️ कानून के सामने चुनौती

वसीम की हत्या और उससे जुड़े पुराने मामलों ने यह साफ कर दिया है कि दिल्ली में गैंगवार महज़ व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं, बल्कि संगठित अपराध का जटिल स्वरूप बन चुकी है। अब यह देखना अहम होगा कि जांच एजेंसियां इस पूरे नेटवर्क को कितनी गहराई से उजागर कर पाती हैं और क्या यह सिलसिला यहीं थमता है या आगे और नाम जुड़ते हैं।


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