गुजरात के गांधीनगर में स्थित एक शैक्षणिक संस्थान ने कचरा प्रबंधन को लेकर एक ऐसी पहल शुरू की है, जो स्वच्छता और ऊर्जा उत्पादन दोनों के क्षेत्र में मिसाल बन रही है। इस संस्थान में उत्पन्न होने वाले जैविक कचरे का उपयोग कर बायोगैस तैयार की जाती है, जिसका इस्तेमाल प्रतिदिन 500 से अधिक लोगों के लिए भोजन पकाने में किया जा रहा है।

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यह पहल स्वच्छ भारत मिशन-शहरी 2.0 के उद्देश्यों को धरातल पर साकार करने का एक सशक्त उदाहरण है। जहां आमतौर पर कचरा पर्यावरण के लिए समस्या बन जाता है, वहीं इस संस्थान ने उसे संसाधन में बदलकर दिखाया है। जैविक अपशिष्ट को वैज्ञानिक तरीके से प्रोसेस कर गैस में परिवर्तित किया जाता है, जिससे रसोई के लिए स्वच्छ और सस्ती ऊर्जा प्राप्त होती है।

सांकेतिक तस्वीर

इस व्यवस्था का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इससे कचरे का प्रभावी निस्तारण होता है और लैंडफिल पर दबाव कम पड़ता है। साथ ही, पारंपरिक ईंधनों जैसे एलपीजी पर निर्भरता घटती है, जिससे कार्बन उत्सर्जन में भी कमी आती है। यह मॉडल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

संस्थान की यह पहल यह भी दर्शाती है कि यदि तकनीक और जागरूकता का सही उपयोग किया जाए, तो कचरे जैसी समस्या को भी अवसर में बदला जा सकता है। यह न केवल ऊर्जा आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देता है, बल्कि आर्थिक रूप से भी लाभकारी सिद्ध होता है।

गुजरात का यह उदाहरण देश के अन्य शहरों, शैक्षणिक संस्थानों और नगर निकायों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन सकता है। यदि इस तरह के मॉडल को व्यापक स्तर पर अपनाया जाए, तो स्वच्छ भारत अभियान को नई गति मिल सकती है और एक स्वच्छ, हरित एवं टिकाऊ भविष्य का निर्माण संभव हो सकेगा।

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गुजरात के गांधीनगर में स्थित एक शैक्षणिक संस्थान ने कचरा प्रबंधन को लेकर एक ऐसी पहल शुरू की है, जो स्वच्छता और ऊर्जा उत्पादन दोनों के क्षेत्र में मिसाल बन रही है। इस संस्थान में उत्पन्न होने वाले जैविक कचरे का उपयोग कर बायोगैस तैयार की जाती है, जिसका इस्तेमाल प्रतिदिन 500 से अधिक लोगों के लिए भोजन पकाने में किया जा रहा है।

लेखक:हिट एंड हॉट न्यूज़ डेस्क|प्रकाशित:अप्रैल 27, 2026

यह पहल स्वच्छ भारत मिशन-शहरी 2.0 के उद्देश्यों को धरातल पर साकार करने का एक सशक्त उदाहरण है। जहां आमतौर पर कचरा पर्यावरण के लिए समस्या बन जाता है, वहीं इस संस्थान ने उसे संसाधन में बदलकर दिखाया है। जैविक अपशिष्ट को वैज्ञानिक तरीके से प्रोसेस कर गैस में परिवर्तित किया जाता है, जिससे रसोई के लिए स्वच्छ और सस्ती ऊर्जा प्राप्त होती है।

सांकेतिक तस्वीर

इस व्यवस्था का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इससे कचरे का प्रभावी निस्तारण होता है और लैंडफिल पर दबाव कम पड़ता है। साथ ही, पारंपरिक ईंधनों जैसे एलपीजी पर निर्भरता घटती है, जिससे कार्बन उत्सर्जन में भी कमी आती है। यह मॉडल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

संस्थान की यह पहल यह भी दर्शाती है कि यदि तकनीक और जागरूकता का सही उपयोग किया जाए, तो कचरे जैसी समस्या को भी अवसर में बदला जा सकता है। यह न केवल ऊर्जा आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देता है, बल्कि आर्थिक रूप से भी लाभकारी सिद्ध होता है।

गुजरात का यह उदाहरण देश के अन्य शहरों, शैक्षणिक संस्थानों और नगर निकायों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन सकता है। यदि इस तरह के मॉडल को व्यापक स्तर पर अपनाया जाए, तो स्वच्छ भारत अभियान को नई गति मिल सकती है और एक स्वच्छ, हरित एवं टिकाऊ भविष्य का निर्माण संभव हो सकेगा।