फ़रवरी 13, 2026

धोलावीरा: भारत की प्राचीन सभ्यता का गौरवशाली प्रतीक

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Anoop singh

भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने हाल ही में गुजरात के कच्छ जिले में स्थित धोलावीरा, जो कि यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है, का दौरा किया। यह ऐतिहासिक स्थल हड़प्पा सभ्यता का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है और इसे प्राचीन भारतीय इतिहास की अमूल्य धरोहरों में गिना जाता है।

धोलावीरा: हड़प्पा सभ्यता का अनमोल खजाना

धोलावीरा, जिसे 2021 में यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया, भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे महत्वपूर्ण और अच्छी तरह से संरक्षित पुरातात्विक स्थलों में से एक है। यह स्थल हड़प्पा सभ्यता की उन्नत नगर नियोजन कला, इंजीनियरिंग कौशल, और जल संरक्षण प्रणाली को प्रदर्शित करता है।

यह स्थल कच्छ जिले के खादिर नामक एक शुष्क द्वीप पर स्थित है, जो अपनी अनूठी भौगोलिक स्थिति के कारण ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण है। राष्ट्रपति मुर्मु ने धोलावीरा की यात्रा के दौरान भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा किए गए संरक्षण प्रयासों की सराहना की और इस स्थल के विशाल आकार और संरचनाओं से प्रभावित हुईं।

धोलावीरा की अद्भुत विशेषताएं

धोलावीरा का नगर नियोजन अत्यंत परिष्कृत था और यह कई मायनों में आधुनिक तकनीकों से भी उन्नत था। इस स्थल की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  1. व्यवस्थित नगर योजना – धोलावीरा को मुख्य रूप से तीन भागों में विभाजित किया गया था:
    • दुर्ग (किला) – यहाँ शासकों और उच्च अधिकारियों का निवास था।
    • मध्य नगर – यह व्यापारियों और उच्च वर्ग के लोगों के लिए था।
    • निचला नगर – इसमें सामान्य नागरिकों का निवास था।
  2. जल संरक्षण प्रणाली – धोलावीरा अपने उन्नत जल संचयन और भंडारण प्रणाली के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ कई विशाल जलाशय और जल निकासी प्रणालियाँ बनाई गई थीं, जो यह दर्शाती हैं कि हड़प्पा सभ्यता के लोग जल प्रबंधन में कितने निपुण थे।
  3. प्राचीन लिपि और संकेत – खुदाई के दौरान यहाँ हड़प्पाई लिपि के बड़े-बड़े संकेत मिले हैं, जो यह दर्शाते हैं कि यहाँ के लोग लेखन प्रणाली से परिचित थे।
  4. व्यापार और सांस्कृतिक संबंध – धोलावीरा के अवशेष यह संकेत देते हैं कि इस सभ्यता के संबंध प्राचीन मेसोपोटामिया और अन्य कांस्य युगीन सभ्यताओं से थे। यहाँ से मिलने वाले पुरातात्विक प्रमाण इस क्षेत्र के समृद्ध व्यापारिक इतिहास को दर्शाते हैं।

राष्ट्रपति की यात्रा और ऐतिहासिक महत्व

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की इस यात्रा ने धोलावीरा की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को और अधिक स्पष्ट किया है। उन्होंने इस स्थल को देखने और समझने के लिए कम से कम 3-4 दिन का समय आवश्यक बताया, जिससे इस स्थल की जटिलता और महत्व का अंदाजा लगाया जा सकता है।

राष्ट्रपति के साथ गुजरात के राज्यपाल और अन्य गणमान्य व्यक्ति भी उपस्थित थे। एएसआई के महानिदेशक श्री वाई.एस. रावत ने उन्हें धोलावीरा की प्रमुख खोजों और संरक्षण कार्यों की विस्तृत जानकारी दी।

पुरातात्विक खुदाई और निष्कर्ष

धोलावीरा की खुदाई 1990-2005 के बीच डॉ. रविन्द्र सिंह बिष्ट के नेतृत्व में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा की गई थी। यहाँ 3000-1500 ईसा पूर्व के दौरान विकसित हुई सात सांस्कृतिक परतों के प्रमाण मिले, जो इसे एक बहुपरत सभ्यता के रूप में दर्शाते हैं।

खुदाई से यह भी पता चला कि हड़प्पा सभ्यता के लोग अत्यधिक संगठित जीवन शैली जीते थे, और उनकी निर्माण तकनीक, जल प्रबंधन, और नगर नियोजन प्रणाली अत्यंत उन्नत थी।

धोलावीरा की वैश्विक पहचान और पर्यटन की संभावनाएँ

2021 में यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित किए जाने के बाद धोलावीरा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष पहचान मिली। यह स्थल इतिहास प्रेमियों, पुरातत्वविदों और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन चुका है।

भारत सरकार और गुजरात पर्यटन विभाग धोलावीरा को एक प्रमुख पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने के लिए निरंतर प्रयास कर रहे हैं। राष्ट्रपति की इस यात्रा से इस ऐतिहासिक स्थल के प्रति जागरूकता और अधिक बढ़ेगी तथा भारत की प्राचीन विरासत के संरक्षण के महत्व को बल मिलेगा।

निष्कर्ष

धोलावीरा भारत की गौरवशाली प्राचीन सभ्यता का एक सजीव प्रमाण है। यह स्थल न केवल हड़प्पा सभ्यता की उन्नत शहरी संरचना और तकनीकी कौशल को दर्शाता है, बल्कि यह भारत की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक भी है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की यह यात्रा इस स्थल के महत्व को वैश्विक स्तर पर उजागर करने में सहायक सिद्ध होगी और भारतीय पुरातात्विक धरोहर के संरक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगी।

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