भारत में पहली LNG-डीजल डुअल-फ्यूल ट्रेन की शुरुआत, ईंधन बचत और कम उत्सर्जन की दिशा में रेलवे का बड़ा कदम

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नई दिल्ली/अहमदाबाद, 28 सितंबर 2026। भारतीय रेलवे ने वैकल्पिक ईंधन के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की दिशा में एक नई पहल की है। देश में पहली LNG-डीजल डुअल-फ्यूल DEMU ट्रेन को गुजरात के साबरमती से शुरू किया गया है। नई तकनीक से लैस यह ट्रेन एक ही इंजन प्रणाली के माध्यम से LNG और डीजल दोनों का इस्तेमाल करने में सक्षम है। रेलवे का उद्देश्य इस तकनीक के जरिए पारंपरिक डीजल पर निर्भरता कम करना और रेल संचालन को अधिक ऊर्जा-कुशल बनाना है।

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इस ट्रेन की शुरुआत ऐसे समय में हुई है जब भारतीय रेलवे अपने विशाल नेटवर्क में ऊर्जा की खपत कम करने और वैकल्पिक ईंधन को बढ़ावा देने के लिए अलग-अलग तकनीकों पर काम कर रहा है। LNG आधारित डुअल-फ्यूल प्रणाली को इसी व्यापक प्रयास का हिस्सा माना जा रहा है।

क्या है LNG-डीजल डुअल-फ्यूल तकनीक?

LNG का पूरा नाम Liquefied Natural Gas यानी द्रवीकृत प्राकृतिक गैस है। नई ट्रेन की सबसे खास बात यह है कि इसका इंजन केवल एक ईंधन पर निर्भर नहीं रहता। इसमें ऐसी प्रणाली लगाई गई है जिसके माध्यम से इंजन LNG और डीजल दोनों का इस्तेमाल कर सकता है।

इस व्यवस्था का व्यावहारिक लाभ यह है कि यदि किसी समय LNG की उपलब्धता सीमित हो तो ट्रेन डीजल के सहारे संचालन जारी रख सकती है। दूसरी ओर, LNG उपलब्ध होने पर उसका उपयोग करके डीजल की खपत में कमी लाई जा सकती है।

उपलब्ध परियोजना विवरण के अनुसार, वर्तमान प्रणाली लगभग 40 प्रतिशत तक डीजल की जगह LNG के इस्तेमाल की क्षमता रखती है। इससे रेलवे को ईंधन के मिश्रित उपयोग के माध्यम से परिचालन में अधिक लचीलापन मिल सकता है।

दो 1,400 हॉर्सपावर वाली पावर कारों में बदलाव

इस परियोजना के तहत साबरमती स्थित इंटीग्रेटेड कोचिंग डिपो में दो 1,400 हॉर्सपावर क्षमता वाली Driving Power Cars को LNG-डीजल डुअल-फ्यूल प्रणाली के अनुरूप बदला गया है।

इन पावर कारों में LNG के भंडारण और इस्तेमाल के लिए विशेष व्यवस्था की गई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार प्रत्येक पावर कार में लगभग 2,200 लीटर क्षमता का LNG टैंक लगाया गया है। इस तकनीकी बदलाव का उद्देश्य मौजूदा डीजल आधारित प्रणाली को पूरी तरह बदलना नहीं, बल्कि उसमें LNG को वैकल्पिक ईंधन के रूप में शामिल करना है।

नई व्यवस्था को यात्री सेवा में उतारने से पहले इसका व्यापक परीक्षण भी किया गया। दोनों परिवर्तित पावर कारों ने मिलाकर 2,000 किलोमीटर से अधिक का फील्ड ट्रायल पूरा किया। इन परीक्षणों के दौरान तकनीक की कार्यक्षमता, विश्वसनीयता और परिचालन संबंधी पहलुओं को जांचा गया।

साबरमती से महेसाणा तक पहली यात्रा

देश की पहली LNG-डीजल डुअल-फ्यूल DEMU ट्रेन की उद्घाटन यात्रा गुजरात में साबरमती से महेसाणा जंक्शन के बीच हुई। यह आठ कोच वाली नॉन-एसी चेयर कार ट्रेन है।

उद्घाटन यात्रा के लिए चुना गया यह मार्ग लगभग 62 किलोमीटर का है और सामान्य परिस्थितियों में इसे करीब एक घंटे 20 मिनट में पूरा करने की जानकारी सामने आई है। इस दौरान ट्रेन झुलासन, डांगरवा, अंबलियासन और जगुदन जैसे स्टेशनों से गुजरती है।

हालांकि उद्घाटन यात्रा के बाद ट्रेन का नियमित परिचालन मार्ग अलग से तय किया जाना है। रेलवे की ओर से नियमित रूट की अंतिम जानकारी बाद में घोषित की जानी है।

डीजल की खपत में कमी पर जोर

भारतीय रेलवे के लिए डीजल की खपत कम करना आर्थिक और पर्यावरणीय, दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण विषय है। डीजल आधारित ट्रेनों के संचालन में ईंधन की कीमत परिचालन खर्च का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होती है।

LNG को डीजल के साथ इस्तेमाल करने से कुल डीजल खपत में कमी लाने का प्रयास किया जा रहा है। परियोजना से जुड़े परीक्षण आधारित अनुमान के अनुसार, एक Driving Power Car से सालाना करीब 11.9 लाख रुपये की बचत का अनुमान लगाया गया है। आठ कोच वाली पूरी DEMU ट्रेन के लिए यह अनुमानित वार्षिक बचत लगभग 23.9 लाख रुपये बताई गई है।

हालांकि वास्तविक बचत ट्रेन के संचालन, ईंधन की कीमत, LNG की उपलब्धता, यात्रा दूरी और परिचालन परिस्थितियों जैसे कई कारकों पर निर्भर करेगी।

प्रदूषण कम करने की उम्मीद

LNG आधारित प्रणाली का एक प्रमुख उद्देश्य उत्सर्जन में कमी लाना भी है। रेलवे के अनुसार LNG के इस्तेमाल से डीजल की खपत घटने के साथ कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और पार्टिकुलेट मैटर जैसे उत्सर्जकों में कमी लाने में मदद मिल सकती है।

यह पहल विशेष रूप से उन रेल मार्गों के लिए उपयोगी हो सकती है जहां अभी भी डीजल आधारित ट्रेनें संचालित होती हैं और विद्युतीकरण की स्थिति अलग-अलग है।

हालांकि LNG को शून्य-उत्सर्जन ईंधन नहीं माना जा सकता। इसलिए इस तकनीक को पूर्ण रूप से कार्बन-मुक्त रेल परिवहन के बजाय जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता और डीजल खपत घटाने वाली एक संक्रमणकालीन तकनीक के रूप में समझना अधिक उचित होगा।

LNG उपलब्ध न होने पर डीजल का विकल्प

डुअल-फ्यूल प्रणाली का एक महत्वपूर्ण पहलू इसका लचीलापन है। केवल LNG पर निर्भर ट्रेन के सामने ईंधन उपलब्धता और रिफ्यूलिंग नेटवर्क जैसी चुनौतियां हो सकती हैं। लेकिन नई ट्रेन में डीजल का विकल्प मौजूद है।

इसका मतलब है कि LNG की उपलब्धता में किसी तरह की समस्या आने पर ट्रेन का संचालन केवल इसी कारण रुकना जरूरी नहीं होगा। आवश्यकता के अनुसार डीजल का इस्तेमाल किया जा सकता है।

इस तरह रेलवे को वैकल्पिक ईंधन अपनाने के साथ-साथ परिचालन की निरंतरता बनाए रखने का रास्ता भी मिलता है।

भारतीय रेलवे के वैकल्पिक ईंधन अभियान में नया अध्याय

भारतीय रेलवे पिछले कुछ वर्षों में ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों और अधिक पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों पर प्रयोग करता रहा है। LNG ट्रेन की शुरुआत इसी क्रम में एक और कदम है।

इससे पहले रेलवे ने हाइड्रोजन आधारित ट्रेन तकनीक की दिशा में भी पहल की है। LNG और हाइड्रोजन तकनीक की कार्यप्रणाली अलग है। LNG ट्रेन में आंतरिक दहन इंजन को डुअल-फ्यूल व्यवस्था के लिए अनुकूलित किया गया है, जबकि हाइड्रोजन ट्रेन अलग तकनीकी प्रणाली पर आधारित है।

LNG परियोजना की खासियत यह है कि इसमें मौजूदा डीजल आधारित रेल संचालन को पूरी तरह समाप्त किए बिना वैकल्पिक ईंधन को शामिल करने का प्रयास किया गया है।

आगे क्या हो सकता है?

पहली LNG-डीजल डुअल-फ्यूल DEMU के परिचालन से प्राप्त अनुभव भविष्य की योजनाओं के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। रेलवे यदि इस तकनीक से ईंधन बचत, रखरखाव, विश्वसनीयता और उत्सर्जन में अपेक्षित परिणाम हासिल करता है, तो भविष्य में ऐसी तकनीक के विस्तार की संभावनाओं का अध्ययन किया जा सकता है।

इसके लिए LNG की आपूर्ति व्यवस्था, ईंधन भरने की सुविधाएं, सुरक्षा मानक, रखरखाव लागत और अलग-अलग मार्गों पर ट्रेन के प्रदर्शन जैसे पहलुओं का मूल्यांकन जरूरी होगा।

विशेषज्ञ दृष्टि से देखा जाए तो किसी भी वैकल्पिक ईंधन तकनीक की सफलता केवल ट्रेन शुरू करने से तय नहीं होती। लंबे समय तक उसके वास्तविक ईंधन खर्च, परिचालन प्रदर्शन, रखरखाव आवश्यकताओं और पर्यावरणीय प्रभाव का आंकलन भी महत्वपूर्ण होता है।

रेलवे के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह कदम?

भारत जैसे विशाल देश में रेलवे प्रतिदिन बड़ी मात्रा में यात्रियों और माल को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाता है। ऐसे में ईंधन दक्षता में छोटी-सी सुधार भी बड़े स्तर पर प्रभाव डाल सकती है।

LNG-डीजल डुअल-फ्यूल ट्रेन का प्रयोग इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि यह वैकल्पिक ईंधन और मौजूदा रेल तकनीक के बीच एक व्यावहारिक संयोजन प्रस्तुत करता है। इसमें रेलवे को डीजल की खपत घटाने का अवसर मिलता है, जबकि डीजल का बैकअप विकल्प भी बना रहता है।

देश की पहली LNG-डीजल डुअल-फ्यूल DEMU ट्रेन की शुरुआत भारतीय रेलवे के ऊर्जा परिवर्तन के प्रयासों में एक नया चरण जोड़ती है। इसके वास्तविक परिणाम आने वाले समय में सामने आएंगे। यदि तकनीक अपेक्षित रूप से ईंधन बचत, लागत नियंत्रण और उत्सर्जन में कमी लाने में सफल रहती है, तो यह भारत में गैर-विद्युतीकृत या आंशिक रूप से विद्युतीकृत रेल मार्गों के लिए वैकल्पिक ईंधन के इस्तेमाल पर आगे की योजनाओं का आधार बन सकती है।

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भारत में पहली LNG-डीजल डुअल-फ्यूल ट्रेन की शुरुआत, ईंधन बचत और कम उत्सर्जन की दिशा में रेलवे का बड़ा कदम

लेखक:हिट एंड हॉट न्यूज़ डेस्क|प्रकाशित:सितम्बर 28, 2026

नई दिल्ली/अहमदाबाद, 28 सितंबर 2026। भारतीय रेलवे ने वैकल्पिक ईंधन के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की दिशा में एक नई पहल की है। देश में पहली LNG-डीजल डुअल-फ्यूल DEMU ट्रेन को गुजरात के साबरमती से शुरू किया गया है। नई तकनीक से लैस यह ट्रेन एक ही इंजन प्रणाली के माध्यम से LNG और डीजल दोनों का इस्तेमाल करने में सक्षम है। रेलवे का उद्देश्य इस तकनीक के जरिए पारंपरिक डीजल पर निर्भरता कम करना और रेल संचालन को अधिक ऊर्जा-कुशल बनाना है।

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इस ट्रेन की शुरुआत ऐसे समय में हुई है जब भारतीय रेलवे अपने विशाल नेटवर्क में ऊर्जा की खपत कम करने और वैकल्पिक ईंधन को बढ़ावा देने के लिए अलग-अलग तकनीकों पर काम कर रहा है। LNG आधारित डुअल-फ्यूल प्रणाली को इसी व्यापक प्रयास का हिस्सा माना जा रहा है।

क्या है LNG-डीजल डुअल-फ्यूल तकनीक?

LNG का पूरा नाम Liquefied Natural Gas यानी द्रवीकृत प्राकृतिक गैस है। नई ट्रेन की सबसे खास बात यह है कि इसका इंजन केवल एक ईंधन पर निर्भर नहीं रहता। इसमें ऐसी प्रणाली लगाई गई है जिसके माध्यम से इंजन LNG और डीजल दोनों का इस्तेमाल कर सकता है।

इस व्यवस्था का व्यावहारिक लाभ यह है कि यदि किसी समय LNG की उपलब्धता सीमित हो तो ट्रेन डीजल के सहारे संचालन जारी रख सकती है। दूसरी ओर, LNG उपलब्ध होने पर उसका उपयोग करके डीजल की खपत में कमी लाई जा सकती है।

उपलब्ध परियोजना विवरण के अनुसार, वर्तमान प्रणाली लगभग 40 प्रतिशत तक डीजल की जगह LNG के इस्तेमाल की क्षमता रखती है। इससे रेलवे को ईंधन के मिश्रित उपयोग के माध्यम से परिचालन में अधिक लचीलापन मिल सकता है।

दो 1,400 हॉर्सपावर वाली पावर कारों में बदलाव

इस परियोजना के तहत साबरमती स्थित इंटीग्रेटेड कोचिंग डिपो में दो 1,400 हॉर्सपावर क्षमता वाली Driving Power Cars को LNG-डीजल डुअल-फ्यूल प्रणाली के अनुरूप बदला गया है।

इन पावर कारों में LNG के भंडारण और इस्तेमाल के लिए विशेष व्यवस्था की गई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार प्रत्येक पावर कार में लगभग 2,200 लीटर क्षमता का LNG टैंक लगाया गया है। इस तकनीकी बदलाव का उद्देश्य मौजूदा डीजल आधारित प्रणाली को पूरी तरह बदलना नहीं, बल्कि उसमें LNG को वैकल्पिक ईंधन के रूप में शामिल करना है।

नई व्यवस्था को यात्री सेवा में उतारने से पहले इसका व्यापक परीक्षण भी किया गया। दोनों परिवर्तित पावर कारों ने मिलाकर 2,000 किलोमीटर से अधिक का फील्ड ट्रायल पूरा किया। इन परीक्षणों के दौरान तकनीक की कार्यक्षमता, विश्वसनीयता और परिचालन संबंधी पहलुओं को जांचा गया।

साबरमती से महेसाणा तक पहली यात्रा

देश की पहली LNG-डीजल डुअल-फ्यूल DEMU ट्रेन की उद्घाटन यात्रा गुजरात में साबरमती से महेसाणा जंक्शन के बीच हुई। यह आठ कोच वाली नॉन-एसी चेयर कार ट्रेन है।

उद्घाटन यात्रा के लिए चुना गया यह मार्ग लगभग 62 किलोमीटर का है और सामान्य परिस्थितियों में इसे करीब एक घंटे 20 मिनट में पूरा करने की जानकारी सामने आई है। इस दौरान ट्रेन झुलासन, डांगरवा, अंबलियासन और जगुदन जैसे स्टेशनों से गुजरती है।

हालांकि उद्घाटन यात्रा के बाद ट्रेन का नियमित परिचालन मार्ग अलग से तय किया जाना है। रेलवे की ओर से नियमित रूट की अंतिम जानकारी बाद में घोषित की जानी है।

डीजल की खपत में कमी पर जोर

भारतीय रेलवे के लिए डीजल की खपत कम करना आर्थिक और पर्यावरणीय, दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण विषय है। डीजल आधारित ट्रेनों के संचालन में ईंधन की कीमत परिचालन खर्च का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होती है।

LNG को डीजल के साथ इस्तेमाल करने से कुल डीजल खपत में कमी लाने का प्रयास किया जा रहा है। परियोजना से जुड़े परीक्षण आधारित अनुमान के अनुसार, एक Driving Power Car से सालाना करीब 11.9 लाख रुपये की बचत का अनुमान लगाया गया है। आठ कोच वाली पूरी DEMU ट्रेन के लिए यह अनुमानित वार्षिक बचत लगभग 23.9 लाख रुपये बताई गई है।

हालांकि वास्तविक बचत ट्रेन के संचालन, ईंधन की कीमत, LNG की उपलब्धता, यात्रा दूरी और परिचालन परिस्थितियों जैसे कई कारकों पर निर्भर करेगी।

प्रदूषण कम करने की उम्मीद

LNG आधारित प्रणाली का एक प्रमुख उद्देश्य उत्सर्जन में कमी लाना भी है। रेलवे के अनुसार LNG के इस्तेमाल से डीजल की खपत घटने के साथ कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और पार्टिकुलेट मैटर जैसे उत्सर्जकों में कमी लाने में मदद मिल सकती है।

यह पहल विशेष रूप से उन रेल मार्गों के लिए उपयोगी हो सकती है जहां अभी भी डीजल आधारित ट्रेनें संचालित होती हैं और विद्युतीकरण की स्थिति अलग-अलग है।

हालांकि LNG को शून्य-उत्सर्जन ईंधन नहीं माना जा सकता। इसलिए इस तकनीक को पूर्ण रूप से कार्बन-मुक्त रेल परिवहन के बजाय जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता और डीजल खपत घटाने वाली एक संक्रमणकालीन तकनीक के रूप में समझना अधिक उचित होगा।

LNG उपलब्ध न होने पर डीजल का विकल्प

डुअल-फ्यूल प्रणाली का एक महत्वपूर्ण पहलू इसका लचीलापन है। केवल LNG पर निर्भर ट्रेन के सामने ईंधन उपलब्धता और रिफ्यूलिंग नेटवर्क जैसी चुनौतियां हो सकती हैं। लेकिन नई ट्रेन में डीजल का विकल्प मौजूद है।

इसका मतलब है कि LNG की उपलब्धता में किसी तरह की समस्या आने पर ट्रेन का संचालन केवल इसी कारण रुकना जरूरी नहीं होगा। आवश्यकता के अनुसार डीजल का इस्तेमाल किया जा सकता है।

इस तरह रेलवे को वैकल्पिक ईंधन अपनाने के साथ-साथ परिचालन की निरंतरता बनाए रखने का रास्ता भी मिलता है।

भारतीय रेलवे के वैकल्पिक ईंधन अभियान में नया अध्याय

भारतीय रेलवे पिछले कुछ वर्षों में ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों और अधिक पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों पर प्रयोग करता रहा है। LNG ट्रेन की शुरुआत इसी क्रम में एक और कदम है।

इससे पहले रेलवे ने हाइड्रोजन आधारित ट्रेन तकनीक की दिशा में भी पहल की है। LNG और हाइड्रोजन तकनीक की कार्यप्रणाली अलग है। LNG ट्रेन में आंतरिक दहन इंजन को डुअल-फ्यूल व्यवस्था के लिए अनुकूलित किया गया है, जबकि हाइड्रोजन ट्रेन अलग तकनीकी प्रणाली पर आधारित है।

LNG परियोजना की खासियत यह है कि इसमें मौजूदा डीजल आधारित रेल संचालन को पूरी तरह समाप्त किए बिना वैकल्पिक ईंधन को शामिल करने का प्रयास किया गया है।

आगे क्या हो सकता है?

पहली LNG-डीजल डुअल-फ्यूल DEMU के परिचालन से प्राप्त अनुभव भविष्य की योजनाओं के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। रेलवे यदि इस तकनीक से ईंधन बचत, रखरखाव, विश्वसनीयता और उत्सर्जन में अपेक्षित परिणाम हासिल करता है, तो भविष्य में ऐसी तकनीक के विस्तार की संभावनाओं का अध्ययन किया जा सकता है।

इसके लिए LNG की आपूर्ति व्यवस्था, ईंधन भरने की सुविधाएं, सुरक्षा मानक, रखरखाव लागत और अलग-अलग मार्गों पर ट्रेन के प्रदर्शन जैसे पहलुओं का मूल्यांकन जरूरी होगा।

विशेषज्ञ दृष्टि से देखा जाए तो किसी भी वैकल्पिक ईंधन तकनीक की सफलता केवल ट्रेन शुरू करने से तय नहीं होती। लंबे समय तक उसके वास्तविक ईंधन खर्च, परिचालन प्रदर्शन, रखरखाव आवश्यकताओं और पर्यावरणीय प्रभाव का आंकलन भी महत्वपूर्ण होता है।

रेलवे के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह कदम?

भारत जैसे विशाल देश में रेलवे प्रतिदिन बड़ी मात्रा में यात्रियों और माल को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाता है। ऐसे में ईंधन दक्षता में छोटी-सी सुधार भी बड़े स्तर पर प्रभाव डाल सकती है।

LNG-डीजल डुअल-फ्यूल ट्रेन का प्रयोग इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि यह वैकल्पिक ईंधन और मौजूदा रेल तकनीक के बीच एक व्यावहारिक संयोजन प्रस्तुत करता है। इसमें रेलवे को डीजल की खपत घटाने का अवसर मिलता है, जबकि डीजल का बैकअप विकल्प भी बना रहता है।

देश की पहली LNG-डीजल डुअल-फ्यूल DEMU ट्रेन की शुरुआत भारतीय रेलवे के ऊर्जा परिवर्तन के प्रयासों में एक नया चरण जोड़ती है। इसके वास्तविक परिणाम आने वाले समय में सामने आएंगे। यदि तकनीक अपेक्षित रूप से ईंधन बचत, लागत नियंत्रण और उत्सर्जन में कमी लाने में सफल रहती है, तो यह भारत में गैर-विद्युतीकृत या आंशिक रूप से विद्युतीकृत रेल मार्गों के लिए वैकल्पिक ईंधन के इस्तेमाल पर आगे की योजनाओं का आधार बन सकती है।